पंतनगरर (सू0वि0)। गोविन्द वल्लभ पंत कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के 37वें दीक्षांत समारोह में महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि0) ने बतौर मुख्यतिथि शिरकत की। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए महामहिम ने कहा कि दीक्षांत जैसे इस महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी समारोह में अपनी ऊर्जावान अमृत पीढ़ी से संवाद करने का अवसर प्राप्त होना मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है। उन्होंने इस अवसर पर अपने परिश्रम और समर्पण से यह सफलता अर्जित करने वाले सभी विद्यार्थियों को हृदय से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि आज का यह अवसर केवल डिग्रियों के वितरण का नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र के कृषि इतिहास, उसके संघर्ष, उसकी उपलब्धियों और उसके उज्ज्वल भविष्य का उत्सव है। यह वह महत्वपूर्ण क्षण है, जब हम अतीत की चुनौतियों से सीख लेते हुए वर्तमान की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और एक सशक्त, समृद्ध एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण हेतु नए संकल्पों का निर्माण करते हैं। उन्होंने पंतनगर विश्वविद्यालय के सभी विद्वत शिक्षकों, वैज्ञानिकों, कर्मचारियों एवं अभिभावकों को विशेष रूप से बधाई देते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन, परिश्रम और त्याग के कारण आज इन विद्यार्थियों ने गौरवपूर्ण उपलब्धि अर्जित की है। वास्तव में, किसी भी विद्यार्थी की सफलता के पीछे उसके गुरुजनों और परिवार का अमूल्य योगदान होता है।महामहिम ने कहा कि भारतीय परंपरा में अन्न को श्ब्रह्मश् कहा गया है। शास्त्रों में उल्लेख है- ष्अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम्ष् अर्थात् अन्न का अधिकाधिक उत्पादन करना ही हमारा सर्वोच्च व्रत होना चाहिए। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का मूल मंत्र है। उन्होंने कहा कि अन्न केवल मानव जीवन का आधार नहीं है, बल्कि समस्त जीव-जगत के अस्तित्व की आधारशिला है। अन्न की समृद्धि ही किसी भी समाज को स्थिर, समृद्ध और सशक्त बनाती है। अतः कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि मानवता के संरक्षण और सभ्यता के निरंतर विकास का आधार है। उन्होंने विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज आप सभी अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं। यह केवल डिग्री प्राप्त करने का दिन नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति और विशेष रूप से कृषि एवं ग्रामीण भारत के समग्र विकास के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करने का दिन है। उन्होंने कहा कि आज से आपका प्रत्येक निर्णय, आपका प्रत्येक प्रयास और आपकी प्रत्येक उपलब्धि न केवल आपके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करेगी, बल्कि समाज और राष्ट्र की दिशा को भी प्रभावित करेगी। इसलिए यह क्षण आपके जीवन का एक निर्णायक मोड़ है।महामहिम ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि जब भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की, तब देश की कृषि स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी। खाद्यान्न की भारी कमी, सीमित उत्पादन क्षमता और आयात पर निर्भरता ने देश को ष्ैीपच-जव-डवनजी म्बवदवउलष् की स्थिति में ला खड़ा किया था। पारंपरिक खेती, सीमित सिंचाई संसाधन, उन्नत बीजों और आधुनिक तकनीकों का अभाव - ये सभी हमारी कृषि प्रगति में बड़ी बाधाएं थे। उस समय सबसे बड़ी चुनौती थी- देश के प्रत्येक नागरिक तक भोजन सुनिश्चित करना। ऐसी विषम परिस्थितियों में पंतनगर विश्वविद्यालय की स्थापना एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी निर्णय सिद्ध हुई। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय कृषि परिवर्तन का एक सशक्त केंद्र बना, एक ऐसा आंदोलन जिसने देश की कृषि को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई पहचान प्रदान की।
महामहिम ने कहा कि 1960 और 1970 के दशक में आई हरित क्रांति में इस विश्वविद्यालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। यहाँ के वैज्ञानिकों, शिक्षकों और छात्रों के सामूहिक प्रयासों ने गेहूँ और धान के उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि सुनिश्चित की। उच्च उत्पादकता वाली किस्मों का विकास, आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रसार, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और वैज्ञानिक सोच का समावेश- इन सभी प्रयासों ने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया। उन्होंने कहा कि आज हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत न केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक सशक्त कृषि शक्ति के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय ने ष्ैममक जव च्संजमष् की अवधारणा को साकार करते हुए गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और उनके व्यापक प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाई है। यहाँ से शिक्षित होकर निकले विद्यार्थियों ने देश के विभिन्न राज्यों में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार की मजबूत नींव रखी है। उन्होंने कहा कि आज देश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों में पंतनगर के पूर्व छात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, यह इस विश्वविद्यालय की उत्कृष्टता का प्रमाण है। महामहिम ने कहा कि आज की सदी तकनीक और नवाचार की सदी है। कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन तकनीक, प्रिसिजन फार्मिंग, बायोटेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ये सभी आधुनिक कृषि के नवीन आयाम हैं। उन्होंने कहा कि अब समय की मांग है कि हम पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय करते हुए ष्स्मार्ट एग्रीकल्चरष् की दिशा में आगे बढ़ें। इससे न केवल उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि कृषि अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल भी बनेगी। उन्होंने सभी विद्यार्थियों से आग्रह करते हुए कहा कि खुली आँखों से बड़े सपने देखें। ऐसे सपने देखें जो आपको चैन से बैठने न दें, जो आपको निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। छोटे लक्ष्य केवल सीमित उपलब्धियों तक ले जाते हैं, जबकि बड़े सपने व्यक्ति को असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचाते हैं। आपके सपनों में केवल आपका भविष्य नहीं, बल्कि भारत का भविष्य भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। महामहिम ने कहा कि उत्तराखण्ड के में कृषि के क्षेत्र में अपार संभावनाएं विद्यमान हैं। पर्वतीय कृषि, जैविक खेती, औषधीय पौधों का उत्पादन, मिलेट्स (श्री अन्न), बागवानी एवं उच्च मूल्य वाली फसलें, ये सभी क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने के सशक्त माध्यम बन सकते हैं। सेब, कीवी, ड्रेगन फ्रूट, सब्जियाँ एवं पुष्प उत्पादन जैसी गतिविधियाँ राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखती हैं। यदि इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बाजार उन्मुख सोच अपनाई जाए, तो उत्तराखण्ड कृषि के क्षेत्र में एक मॉडल राज्य बन सकता है। उन्होंने कहा कि पशुपालन- डेयरी, पोल्ट्री और बकरी पालन छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय का स्थायी और भरोसेमंद स्रोत बन सकते हैं। इन क्षेत्रों में तकनीकी प्रशिक्षण, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है और किसानों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि आज का नया भारत ष्विकसित भारत 2047ष् के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब हमारा लक्ष्य केवल आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं है, बल्कि हमें वैश्विक कृषि बाजार में अग्रणी स्थान प्राप्त करना है। निर्यात, मूल्य संवर्धन और गुणवत्ता, ये तीनों क्षेत्र हमें नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। महामहिम ने विद्यार्थियों से कहा कि आपकी यह डिग्री केवल एक प्रमाण पत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दायित्व है, जो आपको समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी ही नहीं, बल्कि उत्तरदायी नेतृत्वकर्ता बनाता है। इसलिए एक अनुशासित, स्वस्थ और सकारात्मक जीवन शैली अपनाना ही आपकी सबसे बड़ी ताकत होगी। उन्होंने विद्यार्थियों से अपेक्षा करते हुए कहा कि आप केवल श्जॉब सीकर्सश् नहीं, बल्कि श्जॉब प्रोवाइडर्सश् बनने का संकल्प लें। कृषि आधारित स्टार्टअप्स, एग्री-बिजनेस, फूड प्रोसेसिंग और ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से आप न केवल अपनी सफलता सुनिश्चित कर सकते हैं, बल्कि समाज में रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर सकते हैं। यही सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर भारत की दिशा है। उन्होंने कहा कि आज के इस अवसर पर मैं हमारे आदरणीय शिक्षकों को विशेष रूप से नमन करता हूँ। गुरु केवल ज्ञान के प्रदाता नहीं होते, वे चरित्र के निर्माता होते हैं। एक शिक्षक ही वह शक्ति है, जो एक साधारण विद्यार्थी को असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित करता है। आप सभी शिक्षक राष्ट्र निर्माण के वास्तविक शिल्पकार हैं, आपके द्वारा दी गई शिक्षा ही भविष्य के भारत की दिशा निर्धारित करती है। महामहिम ने विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप सभी का यह दायित्व है कि अपने ज्ञान, कौशल और संसाधनों का उपयोग केवल अपनी प्रगति तक सीमित न रखें, बल्कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित करें। जब आपका ज्ञान जनकल्याण से जुड़ता है, तभी वह सच्चे अर्थों में सार्थक बनता है। उन्होंने कहा कि ष्राष्ट्र प्रथम-राष्ट्र सर्वोपरिष् का भाव ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति को सामान्य से असाधारण बनाती है। यही भाव आपको कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बनाकर एक ऐसे जीवन की ओर अग्रसर करता है, जो केवल सफल ही नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, प्रेरणादायी और यशस्वी भी हो। उन्होंने कहा कि आप केवल अपने भविष्य के निर्माता नहीं हैं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य के शिल्पकार हैं। आपका परिश्रम, आपकी निष्ठा और आपका संकल्प ही भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ाएगा। याद रखिए! आपकी सफलता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह राष्ट्र के उत्थान में योगदान दें। उन्होंने उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कामना की एवं मेरी शुभकामनाएं दी। इस अवसर पर कृषि मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि आज का यह पावन अवसर हम सभी के लिए गर्व और गौरव का क्षण है। पंतनगर विश्वविद्यालय का यह 37वाँ दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारत की कृषि चेतना, नवाचार और आत्मनिर्भरता की परंपरा का उत्सव है। मैं इस अवसर पर उन सभी विद्यार्थियों को हृदय से बधाई देता हूँ जिन्होंने वर्षों की साधना, अनुशासन और परिश्रम से यह सफलता अर्जित की है। आप सभी न केवल इस विश्वविद्यालय के गौरव हैं, बल्कि उत्तराखण्ड और भारत की कृषि का भविष्य भी हैं।उन्होंने कहा कि पंतनगर की यह भूमि भारत की हरित कांति की जन्म स्थली रही है। यहाँ के वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों ने देश की कृषि को नई दिशा देने का जो कार्य किया है, वह अनुकरणीय और प्रेरणादायी है। पंतनगर से विकसित की गई अनेक फसल किस्में, जैसे पंत धान, पंत गेहूँ, पंत मक्का, पंत सरसों, पंत सोयाबीन आज भी देश के किसानों के विश्वास का प्रतीक हैं। इस विश्वविद्यालय में लैब टू लैंड की भावना को साकार कर दिखाया है, अर्थात प्रयोगशालाओं से निकला ज्ञान सीधे किसानों के खेतों तक पहुँचे, और यही इस संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि है। माननीय मंत्री ने राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए कहा की राज्य सरकार पर्वतीय कृषि की विशिष्टता को संरक्षित और सवंर्धित करने के लिए विषेश प्रयास कर रही है। मोटे अनाज, जिन्हें हम मिलेट्स कहते हैं, आज पोषण और पर्यावरण दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उत्तरखण्ड में रागी, झंगोरा, कोदो और चिनो जैसी फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील हैं। इस वर्ष रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य रू. 4886ध्- प्रति कुंटल निर्धारित किया गया है, जिससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा और प्रेरणा दोनों मिल रही हैं। हमारा प्रयास है कि ये पोषक अनाज राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली और विद्यालयी भोजन योजना में सम्मिलित हों, ताकि किसानों को बाजार और समाज को पोषण दोनों प्राप्त हों। उन्होंने कहा कि पंतनगर विश्वविद्यालय का योगदान कृषि अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ नैनो उर्वरक विकास, मृदा कार्बन संचयन, जैव उर्वरक तकनीक और स्मार्ट सिंचाई प्रणाली पर हो रहे कार्यों से राज्य और देश को नई दिशा मिल रही है। विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों और वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान का पुल बने हुए हैं, जो किसानों को समयानुकूल तकनीक, प्रशिक्षण और सलाह प्रदान कर रहे हैं।
इस अवसर पर क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट ने कहा कि यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह उन वर्षों की कठिन साधना, परिश्रम और समर्पण का उत्सव है, जो हमारे युवा विद्यार्थियों ने अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुंचने के लिए किया है। उन्होंने कहा कि पन्तनगर विश्वविद्यालय का नाम केवल उत्तराखण्ड ही नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व में कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में अत्यन्त सम्मान के साथ लिया जाता है। यह भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय है, जिसने हरित क्रांति की नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि जब देश आजादी के बाद खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, तब इस विश्वविद्यालय ने उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से देश को आत्मनिर्भर बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है, बल्कि कई कृषि उत्पादों में निर्यातक भी बन चुका है और इस उपलब्धि में पन्तनगर का योगदान अविस्मरणीय है। आज हम जिस स्थिति में हैं, वहां पहुंचने के लिए हमारे वैज्ञानिकों, किसानों और संस्थानों ने अथक परिश्रम किया है।
माननीय सांसद ने कहा कि इस विश्वविद्यालय ने पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल किस्में विकसित की, जल संरक्षण तकनीकों पर कार्य किया, किसानों को प्रशिक्षण और विस्तार सेवाएं प्रदान की और यंत्रीकरण को बढ़ावा दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि यह विश्वविद्यालय उत्तराखण्ड को कृषि, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन में मॉडल राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। उन्होंने कहा कि आज देश आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। इसमें कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। किसानों की आय दोगुनी करना, कृषि को लाभकारी बनाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करना, इन सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने में हमारे युवा कृषि स्नातकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज का दिन आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। आपने ज्ञान अर्जित किया है, अब समय है उसे समाज के हित में उपयोग करने का। आप नवाचार को अपनाएं, किसानों के साथ जुड़ें, स्टार्टअप और एग्री-उद्यमिता की ओर बढ़ें एवं गांवों के विकास में योगदान दें। आप केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बनें। याद रखिए आपकी शिक्षा तथी सार्थक है, जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि पन्तनगर विश्वविद्यालय ने हमें एक मजबूत आधार दिया है, उत्तराखण्ड हमें अपार संभावनाएं देता है, और हमारे युवा हमें एक उज्जवल भविष्य की आशा देते हैं।
इस अवसर पर कुलपति डॉ मनमोहन सिंह चैहान ने बताया कि इस दीक्षांत समारोह में 1384 विद्यार्थियों को को उपाधि प्रदान की गई, जिसमें 721 छात्र और 664 छात्राएं शामिल थे। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा आम की नई किस्म तैयार की गई है जिसका नाम सिंदूर ऑपरेशन से प्रेरित होकर सिंदूर ही रखा गया है। उन्होंने विश्वविद्यालय के द्वारा किये गए कार्यों एवं भविष्य की योजनाओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए विश्वविद्यालय के उपलब्धियों की जानकारी दी।
इस अवसर पर विधायक लालकुआं मोहन सिंह बिष्ट, कुलसाचिव दीपा विनय, कुलपति डी एस रावत, नवीन चंद्र लोहनी, डॉ तृप्ता ठाकुर, जगत सिंह बिष्ट, जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया, एसएसपी अजय गणपति, मुख्य विकास अधिकारी दिवेश शाशनी, अपर जिलाधिकारी कौशत्युभ मिश्र, एएसपी उत्तम सिंह नेगी सहित विश्वविद्यालय के अधिष्ठातागण, छात्र छात्राएं आदि उपस्थित थे।