गोविंद बल्लभ पंत के जन्म पर विशेष: -भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
गोविंद बल्लभ पंत के जन्म पर विशेष: -भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा में हुआ था। उन्होंने मुइर सेंट्रल कॉलेज और इलाहाबाद के लॉ कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन में ही वे बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन से प्रेरित हुए और 1905 में काशी में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने गए। पंत ने 1909 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत के लिए नामांकन कराया। वे नैनीताल में बस गए जहाँ वे जल्द ही बार के नेता बन गए। एक युवा वकील के रूप में, उन्होंने 1914 में काशीपुर की एक ग्राम परिषद को उस कानून को चुनौती देने में मदद की , जिसमें स्थानीय लोगों को ब्रिटिश अधिकारियों को मुफ्त परिवहन प्रदान करना अनिवार्य था। पंत ने 1916 में कुमाऊँ परिषद की स्थापना की और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए, और जल्द ही कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रूप से षामिल हो गए। 1923 में वे स्वराज पार्टी के टिकट पर संयुक्त प्रांत विधान परिषद के लिए चुने गए। जब 1928 में साइमन कमीशन संवैधानिक सुधारों का अध्ययन और सिफारिश करने भारत आया, तो लगभग सभी भारतीय राजनीतिक गुटों ने इसका बहिष्कार किया क्योंकि इसमें केवल श्वेत सदस्य थे। पंत ने लखनऊ में इसके खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, जहाँ पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया। इस हमले के परिणामस्वरूप, वे स्थायी रूप से विकलांग हो गए। पंत 1926 में संयुक्त प्रांत प्रांतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चुने गए और 1946 में राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य बने। 1931 में उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया, जिससे वे राष्ट्रीय आलाकमान के करीब आ गए। 1937 में, वे संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री बने, जब तक कि 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की जबरन भागीदारी के विरोध में सभी कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा नहीं दे दिया। पंत ने नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वे उन कई नेताओं में से एक थे जिन्हें 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की योजना बनाने के लिए, और फिर 1933, 1940 और 1942 में भी, पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था । पंत संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के लिए चुने गए थे। सभा में उन्होंने पृथक निर्वाचिका, नागरिकता, संपत्ति के अधिकार और संघवाद पर भाषण दिए। पंत उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने 1955 तक लगभग एक दषक तक राज्य का नेतृत्व किया । इसके बाद उन्होंने 1955 से 1961 में अपनी मृत्यु तक नेहरू मंत्रिमंडल में गृहमंत्री के रूप में कार्य किया। उन्हें 1957 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न, प्रदान किया गया।











